Friday, January 10, 2014

सबको जाते यूँ ही देखा

फिर से चली है सर्द हवा, फिर धुल उडी है हलकी सी,
यादों के आँगन में फिर से, एक साया सा हमने देखा!

दिल में हुआ है कुछ फिर से, कुछ धुंआ उड़ा है फिर से कहीं,
मैं फिर से बैठा जाता हूँ, ये क्या फिर से हमने देखा!


कुछ स्याही बिखरी कागज़ पर, फिर शब्द से ऐसे बनने लगी,
दिल गीला-गीला फिर से हो उठा, कुछ मंज़र इसने फिर से देखा!


एक फूल जो सूखा-सूखा था, यूँ पतॊ में फिर बिखर गया,
कुछ रंग जो उसका छुटा था, उसे स्याही में हमने देखा!


यूँ जाते हैं पल इक-इक पल, यूँ बनते हैं फिर आज से कल,
जिंदा रहने की प्यास में यूँ, खुद को पल-पल मरते देखा!


देखा है सब कम होते हुए, सबकी आँखें नम होते हुए,
हो प्यार किसी का या ममता हो, सबको मद्धम होते देखा!


वक़्त के परिंदे या रेत् के पल, रुक जाते कभी तो यूँ होता,
कुछ कह सुन लेते तुमसे भी, सबको जाते यूँ ही देखा!!

एक कविता

कुछ प्यार के पल जो बांटे थे, कुछ फूल भी थे कुछ कांटे थे!

कुछ दर्द था मीठा-मीठा सा, एहसास था धीमा-धीमा सा!

दिल को एक मंज़र याद सा था, एक प्यार भरा जज़्बात सा था!

तब पतझड़ भी एक सावन था, गम भी खुशियों का आँगन था!

झोंके यूँ हवा के चलते थे, पलकों पे सपने खिलते थे!

सपनो की शाखों पर पंछी, उन्मुक्त प्रेम छंद लिखते थे!

वक़्त गया यादें आयीं, दिल का जो हिस्सा सोया था,

जो अब तक यूँ ही खोया था, उसमें कुछ सामान थी लायी!

फिर पतझड़ पतझड़ लगने लगा,

फिर पंछी के गीत खत्म हुए,

फिर लगने लगा मैं जिंदा हूँ,

फिर सपने मेरे सोने चले!!

तहसीन मुनव्वर की एक ग़ज़ल

फिर वही भूली कहानी है क्या
फिर मैरी आँख में पानी है क्या

फिर मुझे उसने बुलाया क्यों है
फिर कोई बात सुनानी है क्या

ज़िन्दगी हो गयी सुनते सुनते
हम को यह मौत भी आनी है क्या

आज फिर मुसकुरा के देखा है
आज फिर आग लगानी है क्या


मुझ क्यों देख रहे हो ऐसे
मैरी तस्वीर बनानी है क्या

रोज़ क्यों गिर रही है उसकी पतंग
उस को दीवार गिरानी है क्या